संसारी व्यक्ति जो इस संसार को सत्य मानता है और ऐसा जानता है कि ये संसार हमेशा बना रहेगा, वह घोर अंधकार में है। वह इस नाशवान संसार में सुख ढूंढता है और उसकी चित्तवृत्ति सदा संसार की वस्तुओं में ही लगी रहती है। ऐसा व्यक्ति निश्चित ही संसार की माया से ग्रस्त है।
उन्हें इस संसार में सुख मिलना ऐसा ही है जैसे रेगिस्तान में भटकते हिरण को दूर से पानी का तालाब दिखना। मृगतृष्णा के कारण हिरण दौड़ता-दौड़ता अपने प्राण दे देता है, पर उसे जल नहीं मिलता। ठीक वैसे ही संसारी जीव धन, पद, स्त्री और भोगों के पीछे दौड़ता रहता है, पर उसे सच्चा सुख कभी मिलता ही नहीं। क्योंकि इस संसार में सुख है ही नहीं।
मन से व्याप्त जीव हमेशा सुख को बाहर ढूंढता है। वह कभी भीतर झांक कर नहीं देखता। इसलिए वह इस मायाजाल से कभी मुक्त होना भी नहीं चाहता। उसे यह बंधन ही सुख जैसा लगता है।
इस संसार में हर व्यक्ति केवल धन-संपदा को पाने का ही पुरुषार्थ करता है। वह इसके लिए छल-कपट करने से भी नहीं चूकता। अपने मित्र, परिजनों या अपने माता-पिता से भी वह केवल धन-संपदा की ही इच्छा रखता है। और जब उसकी यह इच्छा पूरी नहीं होती, तो वह सदा उनसे कठोर व्यवहार करता है, उन्हें अपशब्द कहता है। यही संसार का सत्य है।
ये संसार पल-पल में बदलता रहता है। यह क्षणभंगुर है। यहाँ कोई भी स्थिति स्थायी नहीं है। आज जो अमीर है, कल वह गरीब हो जाता है। गरीब व्यक्ति का तो उसके अपने सगे-संबंधी भी त्याग कर देते हैं और हर कोई उसे घृणा की दृष्टि से देखता है। यह संसार केवल स्वार्थ में ही पड़ा रहता है। यहाँ प्रेम केवल स्वार्थ सिद्धि का दूसरा नाम है।
संसार में भीषण क्लेश नित्य विद्यमान है। कहीं अपराध, कहीं चोरी, कहीं बलात्कार, कहीं युद्ध, कहीं न कहीं चलता ही रहता है। चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है, फिर भी मनुष्य इसी में सुख मानकर बैठा है। यह कितनी बड़ी मूर्खता है।
ये संसार धर्म के नाम पर केवल कर्मकांड, मिथ्या बातें, पाखंड, रीति-रिवाज, ऐसी परम्पराएं जो हज़ारों सालों से चली आ रही हैं जिनका कोई अर्थ नहीं है, उसी में फंसा रहता है और उसको परमात्मा के प्रति भक्ति का नाम देता है। अंदर से संसार के लोगों के मन में केवल लोभ, ईर्ष्या और धन के प्रति ही भक्ति देखी जाती है। वे मंदिर भी जाते हैं तो भगवान से भी धन ही मांगते हैं, मुक्ति नहीं।
इसलिए कहा गया है - ये संसार मूर्ख के लिए स्वर्ग और बुद्धिमान के लिए कैदखाना है। मूर्ख को यहाँ सब अच्छा लगता है, क्योंकि वह इसकी असलियत नहीं जानता। पर ज्ञानी पुरुष को यह संसार जेल की तरह लगता है, जहाँ हर तरफ दुख ही दुख है और वह इससे छूटने के लिए छटपटाता रहता है।
अधिकतर लोगों को परमात्मा का पता ही नहीं है। वे अपने धर्म, अपनी जाति और अपने सम्प्रदाय के अनुसार ही परमात्मा को देखते हैं। उन्होंने परमात्मा को भी अपने छोटे से दायरे में कैद कर दिया है। उन्हें कोई रुचि नहीं कि वे सत्य स्वरूप परमात्मा की ओर जाएं।
इस संसार में चंचल और मंद बुद्धि से युक्त लोग इसी में नष्ट हो जाते हैं। वे सोचते हैं - आज उत्सव है, यह सुहावनी जगह है इसमें यात्रा करनी चाहिए, ये हमारे बान्धव हैं, विशिष्ट भोगों से युक्त यह सुख है। इस प्रकार वे वृथा ही अनेक संकल्प-विकल्प करके अपने अनमोल मनुष्य जीवन को नष्ट कर देते हैं।
मेरा-मेरे के भ्रम में इनका मन इस तरह बंधा है जैसे कभी छूटने का उपाय ही न हो। मैं और मेरा ही सारा संसार है। मेरा घर, मेरा पैसा, मेरे बच्चे। इसी अहंकार में वह जीवन भर दुखी रहता है।
संसारी व्यक्ति बाहर से सदा सुखी दिखता है और परमात्मा का सच्चा भक्त हमेशा परेशान लगता है। पर यह केवल बाहर का दिखावा है। भीतर से संसारी व्यक्ति सदा जलता रहता है चिंता में, और भक्त भीतर से परम शांति में रहता है, चाहे बाहर से उसे कष्ट ही क्यों न दिख रहा हो।
संसार के दोषों की ओर देखो तो इसके सारे क्रियाकलाप धन के ही इर्द-गिर्द घूमते हैं। इस संसार में कोई तरह-तरह के भोग-विलास करता है। हमेशा माता-पिता, मित्र, परिजनों का प्यार ही पाता है और कभी किसी कष्ट का सामना नहीं करता। वहीं दूसरी तरफ किसी को कष्ट ही कष्ट मिलते हैं, वह माता-पिता के द्वारा ही परेशानी में रहता है। यह सब पूर्व जन्म के कर्मों का फल है, पर संसारी जीव इसे समझ नहीं पाता।
योगवशिष्ठ में कहा गया है - संसार की दृष्टियों में ऐसी कौन सी दृष्टि है, जिसमें दोष का सम्बन्ध नहीं है। संसार में कौन सी ऐसी जगह है, जो दुःखदाह न हो। कौन सी इच्छाएं हैं जिनकी प्राप्ति से और इच्छा नहीं जन्मती। कौन सी ऐसी प्रजाएं (जन) हैं, जिनका नाश नहीं होता। कौन सी ऐसी लौकिक क्रियाएं हैं, जिनमें छल नहीं होता। अर्थात सभी दृष्टियां दोषयुक्त हैं, सभी जगहें दुःख से पूर्ण हैं और सभी लोग विनाशी हैं और सम्पूर्ण लौकिक कार्यों में छल-कपट भरा हुआ है।
इसलिए हे साधक! ये संसार का नाश तो होगा ही, लेकिन उससे पहले संसार के मोह का नाश होना जरूरी है। जिसके नाश के बिना वैराग्य का जन्म होना असंभव है। और वैराग्य के बिना परमात्मा की प्राप्ति असंभव है।
तो इस मृगतृष्णा से बाहर निकलो और अपने भीतर झांको, वहीं सच्चा सुख है।
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